कल मैं बाजार के लिए पैदल निकला था मैं उस जगह से गुजरा जहाँ मेरी शिक्षा का बुनियादी स्तर का सृजन हुआ था मैं कुछ देर स्तब्ध रह गया मेरा ध्यान उस मंत्रोच्चार पर पड़ा जो सरस्वती शिशु मंदिर स्कूल के सभी बच्चों द्वारा छुट्टी के समय पंक्तिबद्ध खड़ा होकर गा रहे थे मुझे आज भी याद है उस मंत्र को विसर्जन मंत्र कहा जाता है
इसी गहमा गहमी में मैं अपने अतीत की यादों में पहुँच गया जब मैं भी इसी स्कूल का छात्र हुआ करता था प्रतिदिन स्कूल आना प्रार्थना के लिए सभी एक साथ बराबदा में उपस्थित होना वो बरामदा आज भी वैसा का वैसा ही है जैसा पहले था आज भी चिकना फर्श नही है वही नकासी किया हुआ पत्थर का फर्श जिससे पैरो के टखना में तो दर्द होता था परंतु दोस्तो के साथ बैठने से कोई भी दर्द का अहसास तक नही होता था प्रार्थना से पहले गीत गवाया जाता था सबसे प्रसिद्ध और सब के दिलो दिमाग मे छाया हुआ गीत था भारत प्यार देश हमारा जब भी किसी को गीत गाने के लिए सामने बुलाया जाता इसी गीत को गाकर अपना बचाव कर लेते थे गीत इसलिए सब को याद नही थे कि भारत देश की महिमा का गीत है बल्कि इसलिए याद थे कि ये छोटा और सरल गीत था अगर गीत नही गाते तो आचार्य जी से डांट पड़ती इसीलिए सब इसी गीत से अपना बचाव कर लेते थे
प्रार्थना के बाद बाद कक्षा शुरू होती आचार्य जी के प्रवेश करते ही एक स्वर में आ..चा..र्य ..जी.. प्रणाम कहते हुए खड़ा होते फिर उपस्थिति (अटेंडेंस) होती उपस्थिति के समय भी किया गया शरारत मेरे मन मष्तिष्क में स्पष्ट परिलक्षित हो रहा था कि किस प्रकार जो दोस्त अनुपस्थित रहता उनकी आवाज में उपस्थिति बोल देते थे
फिर पढ़ाई शुरू होती थी उस समय की पढ़ाई भी क्या पढ़ाई थी पता ही नही चलता कि पढ़ रहे है या खेल रहे है जब पढ़ाते पढ़ाते आचार्य जी द्वारा खरबूजा चॉकलेट बांटते देते थे तब आहह..सब के मुंह में पानी आ जाता था और तिगुना रफ्तार और शोर के साथ आवाज निकलता था पता ही नही चलता था कि पढ़ रहे है या शोर कर रहे है फिर घंटी बजते ही रिसेस की छुट्टी होती थी तब हम बच्चों का मुख्य काम होता था पास के ठेले में जाके 1-1रु. की तिरंगा और आमकूट लेना फिर सब दोस्त मिलकर खाना
एक दृश्य और मेरे सामने गुजर रहा था पीपल पेड़ के नीचे बने शिलान्यास चबूतरा जिसकी बनावट ढालू था उसे हम बच्चे अपनी रचनात्मकता से फिसलपट्टी में तब्दील कर दिए थे फिसलन के लिए थोड़ा सा रेत डाल देते थे फिर ऊपर से चढ़ के फिसलते थे ऐसी थी हमारी बचपन की creativity (रचनात्मकता) मुझे नही पता कि आज के बच्चे शायद ही उस फिसल पट्टी का आनंद लेते होंगे
घंटी लगते ही सब बच्चे क्लास की ओर भागते थे फिर। पढ़ाई उसके बाद छुट्टी होती थी खाना(lunch) की जोर की भूख लगी होती थी कब मिले तो कब टूट पड़े
ऐसे स्थिति में हाथ धोना भोजन मन्त्र ये सब करना बड़ा दुखदायी लगता था अंत मे खाना खाने का समय आता था दुख उस समय लगता जब किसी का टिफिन नही खुल रहा होता और मनपसंद सब्जी न हो
इसका भी हमने सोलुशन निकाल लिये थे आखिर हम बच्चे थे न बच्चों के पास हर एक समस्या का समाधान होता है टिफिन को भैया जी से खुलवा लेते थे और रही बात मनपसन्द सब्जी की तो सब दोस्त आपस मे शेयर करके खा लेते थे
कुछ लोग इतने भुक्खड़ भी होते थे जो क्लास के दौरान ही अपना टिफिन सफाया कर लेते थे वो लंच के समय एक दूसरे के मुह ताकते रहते थे
लन्च के बाद आती थी संघर्ष करने की बारी अर्थात टिफिन धोने की बारी उस समय टिफिन धोने के लिए हैंडपंप के पानी के लिए युद्ध जैसा संघर्ष करना पड़ता था किसी का हाथ कट जाता था तो किसी का शर्ट पेंट गिला तो कोई गिर जाता था टिफिन धोने का सुकून तब मिलता जब बरसात के दिनों में स्कूल के पास बहने वाला नाला में पानी भरता तब जी भर के मछली पकड़ते पकड़ते टिफिन धोते थे
फिर घंटी लगते ही सब बच्चे क्लास चले जाते थे उसके बाद फिर से अब इंतज़ार रहता खेल खेलने के छुट्टी का जिसमे खूब खेलते
अचानक से लंबी घंटी लगी सब बच्चे दौड़ते हुए अपने घर को भाग रहे थे इतने मेरा ध्यान टूट गया और मेरे आंखों से आंसू टपक गया मैं कुछ सेकंड में पुरानी यादों को जी चुका था फिर आंसू पोछते हुए मैं बाजार को निकल गया
स्कूल की यादें जो भुलाये नहीं भूले
कविता जो शायद आज गुम हो गए होंगें
1 मुझे छोटी ना समझो कमाल करूँगी
2 बाजार जाउंगी
3 मैं तो ऊँचो पहनूँ घाघरा मैं लज्जो मर
4 टमाटर बड़े मजेदार
5 ऐसा खीर पकाइये सारे मिलकर खाइये
6 एक बटा दो दो बटा चार छोटी छोटी
7 हमर बाबा मोटरसाइकिल चलावय
8 एक चिड़िया के बच्चे चार
9 शादी का बाजा बाजे डम डम
10 देखो भैया राजा की पहचान करनी है
11ये चना किसने बोया किसने बोया रे
12Abcd efg उसमे से निकला पंडित
13 123 बाबू का मशीन
🖊️🖊️🖊️🖊️ DSP की कलम से..............