Friday, June 16, 2023

यादें स्कूल की


कल मैं बाजार के लिए पैदल निकला था मैं उस जगह से गुजरा जहाँ मेरी शिक्षा का बुनियादी स्तर का सृजन हुआ था मैं कुछ देर स्तब्ध रह गया मेरा ध्यान उस मंत्रोच्चार पर पड़ा जो सरस्वती शिशु मंदिर स्कूल के सभी बच्चों द्वारा छुट्टी के समय पंक्तिबद्ध खड़ा होकर गा रहे थे मुझे आज भी याद है उस मंत्र को विसर्जन मंत्र कहा जाता है

इसी गहमा गहमी में मैं अपने अतीत की यादों में पहुँच गया जब मैं भी इसी स्कूल का छात्र हुआ करता था प्रतिदिन स्कूल आना प्रार्थना के लिए सभी एक साथ बराबदा में उपस्थित होना वो बरामदा आज भी वैसा का वैसा ही है  जैसा पहले था आज भी चिकना फर्श नही है वही नकासी किया हुआ पत्थर का फर्श जिससे पैरो के टखना में तो दर्द होता था परंतु दोस्तो के साथ बैठने से कोई भी दर्द का अहसास तक नही होता था प्रार्थना से पहले गीत गवाया जाता था सबसे प्रसिद्ध और सब के दिलो दिमाग मे छाया हुआ गीत था भारत प्यार देश हमारा जब भी किसी को गीत गाने के लिए सामने बुलाया जाता इसी गीत को गाकर अपना बचाव कर लेते थे गीत इसलिए सब को याद नही थे कि भारत देश की महिमा का गीत है बल्कि इसलिए याद थे कि ये  छोटा और सरल गीत था अगर गीत नही गाते तो आचार्य जी से डांट  पड़ती  इसीलिए सब इसी गीत से अपना बचाव कर लेते थे

प्रार्थना के बाद बाद कक्षा शुरू होती आचार्य जी के प्रवेश करते ही एक स्वर में  आ..चा..र्य ..जी.. प्रणाम कहते हुए खड़ा होते फिर उपस्थिति (अटेंडेंस) होती उपस्थिति के समय भी किया गया शरारत मेरे मन मष्तिष्क में स्पष्ट परिलक्षित हो रहा था कि किस प्रकार जो दोस्त अनुपस्थित रहता उनकी आवाज में उपस्थिति बोल देते थे 

फिर पढ़ाई शुरू होती थी उस समय की पढ़ाई भी क्या पढ़ाई थी पता ही नही चलता कि पढ़ रहे है या खेल रहे है जब पढ़ाते पढ़ाते आचार्य जी द्वारा खरबूजा  चॉकलेट बांटते देते थे तब आहह..सब के मुंह में पानी आ जाता था और तिगुना रफ्तार और शोर के साथ आवाज निकलता था पता ही नही चलता था कि पढ़ रहे है या शोर कर रहे है फिर घंटी बजते ही रिसेस की छुट्टी होती थी तब हम बच्चों का मुख्य काम होता था पास के ठेले में जाके 1-1रु. की तिरंगा और आमकूट लेना फिर सब दोस्त मिलकर खाना 

एक दृश्य और मेरे सामने गुजर रहा था पीपल पेड़ के नीचे बने शिलान्यास चबूतरा जिसकी बनावट ढालू था उसे हम बच्चे अपनी रचनात्मकता से फिसलपट्टी में तब्दील कर दिए थे फिसलन के लिए थोड़ा सा रेत डाल देते थे फिर ऊपर से चढ़ के फिसलते थे ऐसी थी हमारी बचपन की creativity (रचनात्मकता)  मुझे नही पता कि आज के बच्चे शायद ही उस फिसल पट्टी का आनंद लेते होंगे

घंटी लगते ही सब बच्चे क्लास की ओर भागते थे फिर। पढ़ाई उसके बाद छुट्टी  होती थी खाना(lunch) की जोर की भूख लगी होती थी कब मिले तो कब टूट पड़े

ऐसे स्थिति में हाथ धोना भोजन मन्त्र ये सब करना बड़ा दुखदायी लगता था अंत मे खाना खाने का समय आता था दुख उस समय लगता जब किसी का टिफिन नही खुल रहा होता और मनपसंद सब्जी न हो

इसका भी हमने सोलुशन निकाल लिये थे आखिर हम बच्चे थे न बच्चों के पास हर एक समस्या का समाधान होता है टिफिन को भैया जी से खुलवा लेते थे और रही बात मनपसन्द सब्जी की तो सब दोस्त आपस मे शेयर करके खा लेते थे 

कुछ लोग इतने भुक्खड़ भी होते थे जो क्लास के दौरान ही अपना टिफिन सफाया कर लेते थे वो लंच के समय एक दूसरे के मुह ताकते रहते थे

 लन्च के बाद आती थी संघर्ष  करने की बारी अर्थात टिफिन धोने की बारी उस समय टिफिन धोने के लिए हैंडपंप के पानी के लिए युद्ध जैसा संघर्ष करना पड़ता था किसी का हाथ कट जाता था तो किसी का शर्ट पेंट गिला तो कोई गिर जाता था टिफिन धोने का सुकून तब मिलता जब बरसात के दिनों में स्कूल के पास बहने वाला नाला में पानी भरता तब जी भर के मछली पकड़ते पकड़ते टिफिन धोते थे

फिर घंटी लगते ही सब बच्चे क्लास चले जाते थे उसके बाद फिर से अब इंतज़ार रहता खेल खेलने के छुट्टी का जिसमे खूब खेलते 

अचानक से लंबी घंटी लगी सब बच्चे दौड़ते हुए अपने घर को भाग रहे थे इतने मेरा ध्यान टूट गया और मेरे आंखों से आंसू टपक गया  मैं कुछ सेकंड में पुरानी यादों को जी चुका था फिर  आंसू पोछते हुए मैं बाजार को निकल गया


स्कूल की यादें जो भुलाये नहीं भूले


 कविता जो शायद आज गुम हो गए होंगें


1 मुझे छोटी ना समझो कमाल करूँगी

2 बाजार जाउंगी 

3 मैं तो ऊँचो पहनूँ घाघरा मैं लज्जो मर

4 टमाटर बड़े मजेदार

5 ऐसा खीर पकाइये सारे मिलकर खाइये

6 एक बटा दो दो बटा चार छोटी छोटी 

7 हमर बाबा मोटरसाइकिल चलावय

8 एक चिड़िया के बच्चे चार

9 शादी का बाजा बाजे डम डम 

10 देखो भैया राजा की पहचान करनी है

11ये चना किसने बोया किसने बोया रे

12Abcd efg उसमे से निकला पंडित 

13 123 बाबू का मशीन


🖊️🖊️🖊️🖊️ DSP की कलम से..............

                







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