ऐ वक्त क्यूँ हमसे रूठा है
न दिन, न रात हमे कुछ भाता है
जब से तू है रूठा
मैं बन गया जग में झूठा
हाल ए दिल किसे सुनाऊ मैं
सब है हमसे रूठा-रूठा
ऐ वक्त क्यूँ हमसे रूठा है
न दिन, न रात हमे कुछ भाता है
आज कल खुद को अकेला पाता हूँ
स्वयं को एक हारा हुआ पाता हूँ
इसीलिए मैं सबसे दूर चला जाता हूँ
ऐ वक्त क्यूँ हमसे रूठा है
न दिन, न रात हमे कुछ भाता है
दास्तां ए दिल सुनाऊँ किसे
सब है अपने मे रीझे
इसलिये दास्तां ए दिल, कागज पे उतार देता हूँ
और अपने जख्मो पर,मरहम भी लगा लेता हूँ
ऐ वक्त क्यूँ हमसे रूठा है
न दिन, न रात हमे कुछ भाता है
आज फिर वो दिन आया है,
निरासा ने मुझे फिर से रुलाया है
करूँ क्या समझ नही आया है
क्योंकि वक्त ने फिर से सताया है
ऐ वक्त क्यूँ हमसे रूठा है
न दिन, न रात हमे कुछ भाता है
मैं हूँ नही कवि या शायर
बस हाल ए दिल बया करता हूँ
इसलिए मैं कलम कागज साथ लिए फिरता हूँ
ऐ वक्त क्यूँ हमसे रूठा है
न दिन, न रात हमे कुछ भाता है
Nice line
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